हे राम!

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इस कविता को मैंने १६ मार्च २०१३ को लिखा था जब ह्यूगो चावेज इस दुनिया से चले बस थे और खबर थी कि वो अपने में यीशु की तस्वीर लेकर मरे हैं| 
अभी कल तक गालियाँ देते थे तुम्हे ,
तेरा नाम इन्हें राजनीति लगता था
सडको पे ये जूलूस निकाल
तेरे अस्तित्व के नेस्तनाबूद की बात
तेरे वजूद पे सवाल
इनकी दुकानदारी थी
ये बस ज्ञान बेचते थे
वो भी डिब्बाबंद
वो बस कभी कभार
सडको पे इस्तेमाल होता
घर लौटते
वही कुत्ते की दूम
तुम तो बस एक कल्पना थे
जिसके ख़त्म करने को
 मुर्दाबाद होता था
किन्तु ये सवाल था
वो दुकान चलायें कैसे
वो रोटी नहीं बेचते थे
वो तो तेरी मौत के लिए
डिब्बाबंद ज्ञान बेचते थे
आसमान की उदासी
जमीं की ख़ामोशी को
और तेरे नाम को पन्नो पे लिख
कल तक जलाते थे
आज जब बंद दरवाजे से
सन्नाटे को चिड ती
एक आवाज़ ” हे राम “
उसने आखिरी वक़्त कहा
सत्  जाग कर विदमान
हो गया है – “हे राम “